निबंध प्रतियोगिता के लिए निबंध: समर्पण पर निबंध | Essay writing Competition in Hindi topics

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निबंध प्रतियोगिता के लिए निबंध | Hindi Nibandh lekhan Pratiyogita

समर्पण पर निबंध | Samarpan par Nibandh

सरल शब्दों में समर्पण का अर्थ है अपने आपको मन व बुद्धि से पूर्णरूपेण किसी ऐसे ईष्ट को नि:स्वार्थपूर्वक सौंप देना, जिस पर पूर्ण श्रद्धा व विश्वास हो अथवा बिना किसी तर्क व संदेह किए बराबर किसी भी उपयोग हेतु ज्यों का त्यों स्वयं को किसी के हवाले कर देना। समर्पण में संदेह व तर्क की कोई गुंजाइश नहीं होती। जिसको समर्पण किया जाता है यदि उस पर संदेह व स्वार्थ है तो वहां समर्पण नहीं होता, बल्कि वह केवल नाम मात्र दिखावा है जो सच्चे समर्पण से कोसों दूर होता है।

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समर्पण पर निबंध | Samarpan par Nibandh

समर्पण में छल छिद्र व कपट का कोई स्थान नहीं होता। रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने जैसे संकेत भी दिया है कि भगवान को छलिया, छिद्रान्वेषी बिलकुल भी पसंद नहीं हैं क्योंकि ये विकार समर्पण में बाधक हैं। समर्पण ठीक वैसे ही है जैसे एक कन्या विवाह के बाद अपने पति के प्रति समर्पित हो जाती है। माता-पिता का मोह छोड़कर वह अपना सब कुछ पति को ही मानती है। पति पर उसका पूर्ण विश्वास होता है। पति पर पूर्ण विश्वास ही उसके लिए जीवन का एक अर्थ है।

समर्पण में श्रद्धा का महत्व ज्यादा होता है। जिस पर श्रद्धा होती है, उसी पर समर्पण होता है। जिस पर श्रद्धा नहीं होती, उस पर समर्पण भी नहीं होता। जब श्रद्धा किसी व्यक्ति पर होती है और उसके प्रति समर्पण होता है तो समर्पण करने वाले को विशेष सुख मिलता है। जब श्रद्धा भगवान के प्रति होती है और व्यक्ति भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण कर देता है तो उसे विशेष आनंद मिलता है। इसीलिए योगी आदमी भगवान से योग लगाते हैं और अपने आप को पूर्ण समर्पित कर देते हैं तो वे सुख, शांति और परमात्मा का आनंद लेते हैं।

समर्पण क्यों करना चाहिए? क्योंकि जब तक समर्पण नहीं होता, तब तक सच्चा सुख नहीं मिलता। सच्चे सुख की प्राप्ति के लिए समर्पण किया जाता है। समर्पण यदि कपटपूर्ण है तो सुख भी दिखावा मात्र ही होगा। समर्पण से ही परमात्मा सहाय बनते हैं। मीरा ने समर्पण यह कहकर कि ‘मेरो तो गिरधर गोपाल बस दूसरो न कोई’ किया तो मीरा को पिलाया जाने वाला जहर परमात्मा ने अमृत में बदल दिया।


द्रौपदी ने हार थक कर जब अंत में केवल और केवल श्रीकृष्ण को समर्पण किया तो भगवान श्रीकृष्ण ने उनका चीर हरण नहीं होने दिया और द्रौपदी की लाज की रक्षा की। द्रौपदी का कुछ काम नहीं आया। काम आया केवल भगवान के प्रति समर्पण। राजा जनक ने अष्टावक्र ऋषि के प्रति समर्पण किया तो राजा जनक को तत्क्षण ज्ञान हो गया। रामकृष्ण परमहंस के प्रति बालक नरेंद्र का, जो कि बाद में स्वामी विवेकानंद के नाम से जाने गए, समर्पण हुआ तो काली मां उनके हृदय में प्रकट हो गई। महात्मा बुद्ध को कोई भी शास्त्र बुद्ध न बना पाया। अंत में बालक सिद्धार्थ परम सत्ता के प्रति एक वट वृक्ष के नीचे बैठे पूर्णरूपेण समर्पित हुए तो वे तत्क्षण बुद्ध हो गए और यही बालक सिद्धार्थ कालांतर में महात्मा बुद्ध कहलाए।

अत: मनुष्य को परम श्रद्धेय परमात्मा के प्रति ही पूर्ण समर्पित होकर अपने जीवन को सरस तथा मधुर बनाने का पुरुषार्थ अवश्य करना चाहिए जो मनुष्य को पूर्णता की ओर भी ले जाता है और पूर्णता की अनुभूति भी कराता है।

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Vivek Hardaha Written by: Writer, YouTuber and tool builder · Madhya Pradesh

Vivek has been online since 2012 and has worked since 2014 across YouTube, blogs and news platforms. He holds an M.Sc. in Computer Science and an M.A. in Sociology. On Vista Hub he writes practical, plain-language guides on tech, money, health, farming and festivals.

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