भूखे आदमी का बेटा 10 साल बाद लौटा… और जिसने उसे झुकाया था, अब उसकी बारी थी

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भूखे आदमी का बेटा 10 साल बाद लौटा… और जिसने उसे झुकाया था, अब उसकी बारी थी

गरीबी कोई अभिशाप नहीं है, गरीबी एक भयंकर बीमारी है। एक ऐसी बीमारी जो इंसान के जिस्म को नहीं, बल्कि उसकी आत्मा, उसके जमीर और उसके स्वाभिमान को धीरे-धीरे सड़ा देती है। शहर के उस बाहरी इलाके की एक टूटी हुई झोपड़ी में आज फिर खांसने की आवाज गूंज रही थी। रामू काका अपनी चारपाई पर पड़े थे। टीबी की बीमारी ने उनके फेफड़ों को इस कदर खोखला कर दिया था कि अब खांसते वक्त उनके मुंह से सिर्फ खून के लोथड़े निकलते थे। घर में पिछले तीन दिन से चूल्हा नहीं जला था। भूख ने उनके पेट को पीठ से चिपका दिया था। लेकिन रामू काका की असली तकलीफ उनकी बीमारी या भूख नहीं थी। उनकी असली तकलीफ वो खौफनाक याद थी जो पिछले दस सालों से उनके सीने में एक खंजर की तरह चुभी हुई थी।

लाचारी की बदबू और वो खौफनाक रात

बात दस साल पुरानी है। रामू काका शहर के सबसे रसूखदार और घमंडी बिल्डर, सेठ रघुनाथ के यहां मजदूरी किया करते थे। रामू का 14 साल का एक बेटा था—शिवा। शिवा पढ़ने में बहुत तेज था, लेकिन गरीबी ने उसके सपनों को जंजीरों में जकड़ रखा था। उस रात झमाझम बारिश हो रही थी। रामू की पत्नी को तेज बुखार था और निमोनिया बिगड़ चुका था। अस्पताल वालों ने बिना एडवांस पैसे के इलाज करने से मना कर दिया था। हार कर रामू काका आधी रात को सेठ रघुनाथ की आलीशान कोठी पर पहुंचे थे। उनके पीछे उनका 14 साल का बेटा शिवा भी चुपचाप चला आया था।

रामू काका ने रघुनाथ के पैरों में गिरकर अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए सिर्फ पांच हजार रुपये की भीख मांगी थी। लेकिन शराब के नशे में धुत रघुनाथ और उसके अमीर दोस्तों के लिए एक गरीब की जान सिर्फ एक मजाक थी। रघुनाथ ने रामू के मुंह पर सिगरेट का धुआं छोड़ते हुए कहा था, "तू साले कीड़े हो कीड़े। जिस दिन काम नहीं करते, उस दिन तुम्हारी औकात दो कौड़ी की नहीं होती। पैसे चाहिए न? तो जा, उस कोने में जो मेरे कुत्ते का जूठा खाना पड़ा है, वो खा ले। फिर सोचूंगा।"

लाचारी इंसान से क्या नहीं करवाती। पत्नी की जान बचाने के लिए रामू काका ने अपने स्वाभिमान का गला घोंट दिया। वो उस जूठे बर्तन की तरफ रेंगते हुए बढ़ने ही वाले थे कि एक नन्हे हाथ ने उनका कंधा पकड़ लिया। वो शिवा था। शिवा की आंखों में आंसू नहीं थे, उन आंखों में एक ऐसी खौफनाक आग जल रही थी जो किसी भी इंसान को भस्म कर दे। शिवा ने अपने बाप को उठाया और बिना एक शब्द कहे वहां से ले गया। रघुनाथ और उसके दोस्त पीछे से ठहाके लगाते रहे, "देखें ये भूखा लौंडा क्या उखाड़ता है! दो दिन बाद फिर भीख मांगने यहीं आएंगे।"

उस रात रामू की पत्नी मर गई। और अगले दिन की सुबह, 14 साल का शिवा बिना किसी को कुछ बताए गांव छोड़कर हमेशा के लिए गायब हो गया।

दस सालों का वो सन्नाटा और समाज के ताने

शिवा को गए दस साल बीत चुके थे। इन दस सालों में रामू काका जिंदा लाश बन गए थे। समाज ने उन्हें कभी जीने नहीं दिया। मोहल्ले के लोग, वही रघुनाथ के चमचे, अक्सर रामू का मजाक उड़ाते। "अरे रामू, तेरा लौंडा तो मुंबई जाके हीरो बनने वाला था न? लगता है किसी गटर में सड़ के मर गया होगा। गरीब के औलाद की किस्मत में सिर्फ जलालत ही तो लिखी है।"

रामू काका खामोश रहते। वो बस उस टूटे दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए देखते रहते। उन्हें अपने बेटे पर यकीन था। लेकिन बीमारी और भूख अब उनके सब्र का इम्तिहान ले रही थी। उधर सेठ रघुनाथ का अहंकार आसमान छू रहा था। उसने अपने काले कारनामों और गरीबों की जमीनें हड़प कर शहर में अपना एक बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लिया था। उसे लगता था कि पैसे की ताकत से वो भगवान बन गया है और उसे कोई नहीं झुका सकता।

सन्नाटे को चीरती वो काली गाड़ियां

आज सुबह भी रामू काका अपनी खटिया पर पड़े खांस रहे थे। तभी अचानक पूरे इलाके में एक अजीब सा शोर मच गया। झोपड़ी के बाहर जो सड़क हमेशा कीचड़ से सनी रहती थी, वहां अचानक आधा दर्जन लग्जरी काली एसयूवी गाड़ियों का काफिला आकर रुका। गाड़ियों के ब्रेक लगने की आवाज ने पूरे मोहल्ले में सनसनी फैला दी। मोहल्ले के लोग अपने घरों से बाहर निकल आए। सबको लगा कि शायद सेठ रघुनाथ फिर किसी की जमीन हड़पने आया है।

सबसे आगे वाली गाड़ी का दरवाजा खुला। काले कोट और सफेद शर्ट में एक लंबा-चौड़ा, शानदार पर्सनालिटी वाला नौजवान बाहर निकला। उसकी आंखों पर काला चश्मा था और चेहरे पर एक ऐसी ठंडी और खौफनाक गंभीरता थी जिसे देखकर किसी की भी रूह कांप जाए। उसके पीछे कुछ लोग फाइल्स लिए चल रहे थे। वो नौजवान सीधे रामू काका की उस टूटी झोपड़ी में दाखिल हुआ।

रामू काका ने धुंधलाती आंखों से उसे देखा। वो नौजवान उनके करीब आया, उसने अपना चश्मा उतारा और घुटनों के बल बैठ गया। "बापू..." उस नौजवान की भारी आवाज पूरे कमरे में गूंज गई। दस साल का इंतजार खत्म हुआ था। वो शिवा था। लेकिन अब वो एक डरा हुआ, भूखा लड़का नहीं था। वो अब एक ऐसी ताकत बन चुका था जिसके आगे शहर के बड़े-बड़े रईस पानी भरते थे।

जब वक्त ने लिया अपना सबसे खौफनाक इंतकाम

शिवा ने अपने बाप को गले लगा लिया। इसके बाद उसने अपनी टीम के एक आदमी को इशारा किया। तुरंत एम्बुलेंस बुलाई गई और रामू काका को शहर के सबसे महंगे अस्पताल में शिफ्ट करने का इंतजाम किया गया। मोहल्ले वाले आंखें फाड़े ये सब देख रहे थे। जो लोग कल तक शिवा के मरने के ताने मारते थे, आज वो डर के मारे अपने होठ सिल चुके थे।

लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी। असली मोटिवेशन तो अब शुरू होने वाला था।

दोपहर के तीन बज रहे थे। सेठ रघुनाथ अपनी कंपनी के हेड ऑफिस में एक बहुत बड़ी डील साइन करने के लिए बैठा था। उसे अपनी कंपनी को दिवालिया होने से बचाने के लिए एक बहुत बड़े इन्वेस्टर की जरूरत थी। तभी रघुनाथ के ऑफिस का बड़ा सा कांच का दरवाजा खुला। और अंदर शिवा दाखिल हुआ।

रघुनाथ ने शिवा को पहचाना नहीं। उसके लिए शिवा सिर्फ एक करोड़पति इन्वेस्टर था जिसने उसकी डूबती हुई कंपनी के सारे शेयर्स खरीद लिए थे। रघुनाथ ने झुककर शिवा को सलाम किया और बोला, "सर, आपके इस एहसान को मैं जिंदगी भर नहीं भूलूंगा। आपने मुझे और मेरी कंपनी को सड़क पर आने से बचा लिया।"

शिवा अपनी कुर्सी पर बहुत ही शान से बैठा। उसने टेबल पर रखी रघुनाथ की महंगी सिगरेट उठाई और उसे जलाया। सिगरेट का एक कश लेकर उसने धुआं सीधा रघुनाथ के मुंह पर छोड़ा... बिल्कुल वैसे ही, जैसे दस साल पहले रघुनाथ ने रामू काका के मुंह पर छोड़ा था।

"मैंने तुम्हारी कंपनी को बचाया नहीं है रघुनाथ..." शिवा की आवाज इतनी ठंडी थी कि कमरे का तापमान गिर गया। "मैंने तुम्हारी कंपनी, तुम्हारा वो आलीशान घर, और तुम्हारी वो सारी जमीनें खरीद ली हैं, जिन पर तुम राज करते हो। और आज... इसी वक्त से... तुम सड़क पर हो।"

रघुनाथ के पैरों तले जमीन खिसक गई। "लेकिन सर... डील तो कुछ और हुई थी... आप ऐसा क्यों कर रहे हैं? मैंने आपका क्या बिगाड़ा है?" रघुनाथ की आवाज कांपने लगी थी।

शिवा अपनी कुर्सी से उठा। वो धीरे-धीरे रघुनाथ के पास गया और उसकी आंखों में आंखें डालकर बोला, "दस साल पहले, तुमने एक लाचार बाप को अपने कुत्ते का जूठा खाना खाने को कहा था। उस बाप का नाम रामू था। मैं उसी भूखे आदमी का बेटा हूँ, रघुनाथ। मैंने अपने बाप को मरते हुए देखा है, तुम्हारी उस अमीरी के घमंड के नीचे। मैं उस दिन वहां से भाग गया था, क्योंकि मुझे पता था कि अगर मैं वहीं रहकर मजदूरी करता, तो कभी तुम्हें तुम्हारी औकात नहीं दिखा पाता। मैंने दिन-रात एक किया, भूखा सोया, सड़कों पर धक्के खाए... सिर्फ इसलिए ताकि एक दिन मैं इस कुर्सी पर बैठ सकूं और तुम्हें तुम्हारे ही घमंड के नीचे कुचल सकूं।"

रघुनाथ के माथे से पसीना टपक रहा था। उसे दस साल पुरानी वो काली रात याद आ गई। जो घमंड उसे भगवान बनाता था, आज वो उसी के पैरों में पड़ा तड़प रहा था।

"तुम्हें क्या लगा था? कि एक भूखा लड़का सिर्फ भीख मांग सकता है?" शिवा ने अपने असिस्टेंट से एक फाइल ली और रघुनाथ के मुंह पर फेंक कर मारी। "ये तुम्हारे दिवालिया होने के पेपर्स हैं। आज से तुम्हारे पास न एक पैसा है, न घर। और हां... अगर तुम्हें भूख लगे, तो मेरे ऑफिस के बाहर के कुत्तों के लिए मैं रोज खाना रखवाता हूँ... तुम चाहो तो जाकर अपना पेट भर सकते हो।"

सफलता से बड़ा कोई इंतकाम नहीं होता। चीख-पुकार, लड़ाई-झगड़ा या खून बहाना तो कमजोरों का काम है। एक असली मर्द अपने अपमान का बदला अपनी कामयाबी से लेता है। शिवा ने रघुनाथ को मारा नहीं, बल्कि उसे जिंदगी भर के लिए एक ऐसी जलालत की मौत दे दी, जहां वो हर रोज मरेगा। गरीबी की भट्ठी में तप कर निकलने वाला लोहा जब वार करता है, तो आवाज नहीं होती... सीधा सामने वाले का वजूद खत्म हो जाता है।

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Vivek Hardaha

Vivek Hardaha

M.Sc. CS • M.A. Sociology • PGD Rural Dev.
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