भरत मिलाप: त्याग और समर्पण की अद्भुत गाथा | Ram Bhart Milaap in Ramayan


Ram Bhart Milaap in Ramayan

रामायण: राम-भरत मिलाप और आज के संपत्ति विवाद - एक कड़वा सच

रामायण का राम-भरत मिलाप: भाई के प्रेम की पराकाष्ठा या सिर्फ मनोरंजन?

भारतीय संस्कृति के स्वर्णिम पृष्ठों में जब भी 'भाई के प्रेम' की मिसाल दी जाती है, तो जुबां पर सबसे पहला और पवित्र नाम राम और भरत का आता है। रामायण का वह भावुक प्रसंग जिसे हम "भरत मिलाप" (Bharat Milap) के नाम से जानते हैं, न केवल आँखों को नम कर देता है, बल्कि रिश्तों की मर्यादा का एक ऐसा मानक स्थापित करता है, जो आज के युग में दुर्लभ है।

लेकिन, एक बड़ा सवाल यह है कि क्या हम वास्तव में रामायण के इस 'मिलाप' से कुछ सीख रहे हैं, या यह हमारे लिए महज एक धार्मिक धारावाहिक का दृश्य बनकर रह गया है?

भरत मिलाप: त्याग और समर्पण की अद्भुत गाथा

जरा विचार कीजिए, एक तरफ अयोध्या का विशाल साम्राज्य भरत के चरणों में पड़ा था। माता कैकेयी ने अपने पुत्र के लिए राज्य मांग लिया था। भरत चाहते तो आसानी से राजा बनकर राज कर सकते थे।

परंतु, चित्रकूट में जब राम और भरत का मिलाप हुआ, तो वहां 'अधिकार' की नहीं, बल्कि 'त्याग' की होड़ लगी थी। राम कह रहे थे, "राज्य तुम्हारा है, तुम संभालो," और भरत कह रहे थे, "भैया, यह राज्य आपका है।" आज इस ऐतिहासिक मिलाप को हम श्रद्धा से पूजते हैं, पर क्या उसे जीते हैं?

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आज का कड़वा सच: मेरा अनुभव

"मैंने अपने जीवन और समाज में एक बहुत ही चिंताजनक बदलाव देखा है। हम बड़े चाव से टीवी पर रामायण देखते हैं, राम-भरत मिलाप पर आंसू भी बहाते हैं। लेकिन जैसे ही टीवी बंद होता है, वास्तविकता सामने आ जाती है।"

आंकड़े और अनुभव गवाह हैं कि भारत में आज 90% भाइयों के बीच विवाद की मुख्य जड़ 'संपत्ति' (Property) है। जिस देश में भरत जैसे भाई हुए, जिन्होंने मिला हुआ राज्य भी ठुकरा दिया, उसी देश में आज भाई-भाई की जान का दुश्मन सिर्फ 'जमीन के टुकड़े' के लिए बन बैठा है। हम रामायण से सीखते नहीं, बस उसे मनोरंजन की तरह देख लेते हैं।"

इस 'मिलाप' से हमें क्या सीखना चाहिए?

रामायण कोई कहानी नहीं, जीवन जीने की पद्धति है। राम-भरत मिलाप हमें सिखाता है कि:

  • संपत्ति क्षणिक है, संबंध शाश्वत: जमीन-जायदाद का बंटवारा हो सकता है, लेकिन भाई के प्रेम का बंटवारा नहीं होना चाहिए।
  • त्याग में ही सुख है: सुख छीनने में नहीं, देने में है। भरत ने राज्य का त्याग किया, इसलिए उनका 'मिलाप' आज भी अमर है।
  • संवाद ही समाधान है: विवादों को कोर्ट में नहीं, बल्कि राम और भरत की तरह प्रेमपूर्वक मिलकर सुलझाना चाहिए।

निष्कर्ष

समय आ गया है कि हम रामायण को केवल पूजा घर तक सीमित न रखें। संपत्ति के विवाद छोड़कर, भरत जैसा 'त्याग' और राम जैसा 'स्नेह' अपनाएं। तभी हमारा राम-भरत मिलाप के बारे में पढ़ना और सुनना सार्थक होगा।

"भाई का प्रेम ही सबसे बड़ी संपत्ति है।"