सोचते-सोचते इंसान थक क्यों जाता है? | Life & Mind

Thoughtful Indian man sitting near a window in evening light, looking mentally tired and deep in thought

सोचते-सोचते इंसान थक क्यों जाता है?

कभी ऐसा हुआ है कि दिन भर कोई खास काम नहीं किया, फिर भी मन इतना थका हुआ लग रहा हो जैसे बहुत कुछ झेल लिया हो?

शरीर ठीक रहता है, लेकिन दिमाग जैसे बोझिल हो जाता है। यह थकान बाहर से नहीं दिखती, लेकिन अंदर बहुत गहरी होती है।

दिमाग कभी चुप नहीं होता

हम काम कर रहे हों या आराम कर रहे हों, दिमाग लगातार चलता रहता है।

बीती बातें, आने वाली चिंताएँ, लोगों की बातें, खुद से तुलना — सब कुछ एक साथ।

समस्या यह नहीं है कि हम सोचते हैं। समस्या यह है कि हम सोचना रोकना भूल गए हैं

एक ही बात का बार-बार घूमना

अगर सोच किसी हल तक पहुँचे, तो वह थकाती नहीं।

लेकिन जब वही बात बार-बार बिना नतीजे के दिमाग में घूमती रहे, तो वही सोच थकान बन जाती है।

यही वजह है कि ज्यादा सोचने वाले लोग कम काम करके भी ज्यादा थके हुए लगते हैं।

मन को भी आराम चाहिए

हम शरीर को तो आराम देते हैं, लेकिन मन को नहीं।

हर खाली पल में मोबाइल देख लेना, मन को कभी शांत होने का मौका ही नहीं देता।

मन भी चाहता है कि कभी कोई सवाल न हो, कोई तुलना न हो, कोई दबाव न हो।

एक छोटी-सी सच्चाई

अगर आप थके हुए महसूस कर रहे हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप कमजोर हैं।

इसका मतलब सिर्फ इतना है कि आपका मन बहुत देर से बिना रुके चल रहा है।

और थके हुए मन को सबसे पहले शांति चाहिए — सलाह नहीं।

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Vivek Hardaha

Vivek Hardaha

M.Sc. CS • M.A. Sociology • PGD Rural Dev.
Web Creator since 2014